कुछ सोच... कुछ इरादे... लिए निकल पड़े..
पड़ाव आते गये ... हम बढ़ते गये..
सफर में रोज़ कुछ नया सीखते गये...
पड़ाव पड़ते गये हम बड़ते गये...
हवा बारिश सब चलते रहे.. हम भी बढ़ते गये....
कभी थक गए तो आसमा की आगोश में सुसता लिए..
पड़ाव पड़ते गए..हम बढ़ते गए...
और ये सफर चलता रहा...अब थकान जरूर होने लगी है...
लेकिन मजिल अभी दूर है..और अभी बहुत चलना है...
पड़ाव पड़ते गए हम बढ़ते गए..
3 Comments:
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साथी
उन कतरनों को सहेजने की कोशिश, जो इतिहास बनाने की कूबत रखते हैं।
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Mohalla Live11 years ago
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जय श्रीराम11 years ago
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अच्छा ज़ज्बा है ...सुंदर कविता
wah