आप अपनी गाड़ी की सही वक्त पर सर्विसिंग कराते हैं। हर संडे उसकी धुलाई करते, चमकाते हैं। लेकिन क्या आप अ पनी कार के टायरों का भी उतना ही ध्यान रखते हैं? इस हफ्ते ऑटो गाइड में टायर की एबीसी समझा रहे हैं शिवेंद्र सिंह चौहान
इंजन के बाद टायरों को कार का सबसे अहम हिस्सा माना जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि सड़क और गाड़ी के बीच का रिश्ता टायरों पर ही निर्भर होता है। कार का माइलेज, हैंडलिंग, बैलेंस और कंट्रोल जैसी कई चीजें काफी हद तक टायरों पर निर्भर होती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि आप अपनी कार के लिए सही टायरों का ही चुनाव करें।
टायर की कुंडली टायर की साइडवॉल पर एक कोड लिखा होता है। टायर के बारे में सारी जानकारी इसी कोड में होती है। मसलन, टायर पर लिखा है P205/65 R 16 95 S तो इसमें P का मतलब है पैसेंजर कार टायर। 205 टायर की चौड़ाई (मिमी में), 65 इसका आस्पेक्ट रेश्यो यानी टायर की चौड़ाई और ऊंचाई का अनुपात। R यानी रेडियल और 16 रिम का डायमीटर यानी व्यास बताता है। यहां 95 लोड इंडेक्स है, जो बताता है कि टायर अधिकतम कितना वजन उठा सकता है। लोड इंडेक्स की स्केल देखने से पता चलता है कि 96 रेटिंग का टायर 690 किलो वजन के लिए बना है। अंत में S यानी टायर की स्पीड रेटिंग। हर टायर के लिए स्पीड की मैक्सिमम लिमिट होती है। इसके लिए A1 से लेकर Y तक रेटिंग दी जाती है। A1 रेटिंग वाले टायर 5 किमी प्रति घंटा और Y रेटिंग वाले टायर 300 किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार पर चल सकते हैं। इस रफ्तार से ज्यादा तेज चलाने पर टायर खराब हो सकता है।
किस्म-किस्म के टायर आमतौर पर टायर दो तरह के होते हैं - ट्यूब टायर और ट्यूबलेस टायर। ज्यादातर छोटी गाडि़यों में कार कंपनियां ट्यूब टायर लगाकर देती हैं। प्रीमियम कारों और छोटी कारों के टॉप-एंड मॉडल्स में ट्यूबलेस टायर ज्यादा दिखते हैं। ट्यूब टायर आमतौर पर ट्यूबलेस टायरों से कम कीमत के होते हैं लेकिन ट्यूब और टायर के बीच होने वाले फ्रिक्शन की वजह से ये टायर जल्दी गर्म होते हैं और इसीलिए पंक्चर भी जल्दी होते हैं। इनके मुकाबले ट्यूबलेस टायर के कई फायदे होते हैं। मसलन, ट्यूबलेस टायर से सड़क पर बेहतर ग्रिप और कंट्रोल मिलता है और खुदा-न-खास्ता टायर पंक्चर हो जाए तो इसमें से हवा धीरे-धीरे निकलती है। आम धारणा है कि ट्यूबलेस टायर्स अलॉय वील्स पर ही लगाने चाहिए लेकिन यह सही नहीं है। स्टील रिम पर भी ट्यूबलेस टायर्स अच्छी परफॉमेंर्स देते हैं। कीमत के लिहाज से ट््यूबलेस टायर ट्यूब टायर से 300-400 रुपये ही महंगा है।
टायर कब बदलें ज्यादातर टायर बनाने वाली कंपनियां 40 हजार किलोमीटर चलने के बाद टायर बदलने की सलाह देती हैं। लेकिन टायर अच्छी हालत में हैं तो आप इन्हें 50 हजार किलोमीटर तक आराम से चला सकते हैं। इससे ज्यादा दूरी पर पुराने टायर से काम चलाना सेफ्टी के लिहाज से सही नहीं है। नियमों के मुताबिक, ट्रेड (टायर पर बने खांचे) की गहराई 1/6 मिमी रह जाए तो टायर बदल दिया जाना चाहिए। जिन लोगों की गाडि़यां काफी कम चलती हैं, उन्हें भी पांच साल के बाद हर साल टायरों का चेकअप कराना चाहिए। 10 साल से पुराने टायर इस्तेमाल नहीं करने चाहिए, चाहे वे जितना भी कम चले हों।
- हर टायर की अपनी उम्र होती है और सेफ्टी के लिहाज से यह जरूरी है कि उसे सही समय पर बदल दिया जाए। टायर कट या फट जाए, किसी एक जगह पर ज्यादा घिस जाए, रिपेयर न हो सकने लायक पंक्चर हो जाए या फिर जल्दी-जल्दी पंक्चर होने लगे, तो उसे बदल देना चाहिए।
टायर की देखरेख महीने में एक बार टायर प्रेशर जरूर चेक कराएं। टायरों में हवा उतनी ही रखें जितनी कार कंपनी ने रेकमेंड की हो। ज्यादा या कम हवा भराने से टायर जल्दी घिसेंगे। कंपनियां यह भी बताती हैं कि कम लोड और फुल लोड पर टायर प्रेशर कितना होना चाहिए। यह भी ध्यान रखें कि स्पेयर टायर में भी एयर प्रेशर हमेशा सही हो। हर 5000 किलोमीटर पर वील रोटेशन और अलाइनमेंट करा लने से टायर की लाइफ बढ़ जाएगी। टायरों के ट्रेड में फंसे कंकड़-पत्थर, कील-कांटे भी समय-समय पर निकालें। पेट्रोलियम बेस्ड डिटरजेंट या केमिकल क्लीनर से टायरों की सफाई न करें।
अपसाइजिंग कई बार सड़कों पर ऐसी गाड़ियां नजर आती हैं, जिनमें काफी चौड़े टायर लगे होते हैं। चौड़े और मोटे टायर लगाने से गाड़ी का लुक काफी स्पोटीर् हो जाता है और सड़क पर ग्रिप बेहतर हो जाती है, लेकिन इससे गाड़ी के माइलेज पर असर पड़ता है। ज्यादातर कार कंपनियां अपसाइजिंग की सलाह नहीं देतीं। उनका तर्क यह होता है कि गाड़ी में ऑरिजिनली उसी साइज के टायर लगाए जाते हैं जो उसके लिए परफेक्ट हों। इसलिए अपसाइजिंग से पहले एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। ज्यादातर टायर कंपनियों की वेबसाइट पर आपको अपसाइजिंग गाइड मिल जाएगी।
टायर कैसे खरीदें भारत में ज्यादातर कारों के टायर (लग्जरी और एसयूवी कैटिगरी को छोड़कर) की कीमत 1500 रुपये से 4000 रुपये के बीच है। टायरों के दाम सीजन के हिसाब से घटते-बढ़ते रहते हैं। टायरों की कीमत में मोलभाव की काफी गुंजाइश होती है, इसलिए माकेर्ट का सवेर् करें और अलग-अलग कंपनियों के टायर देखें, फिर अपनी जरूरत के हिसाब से टायर चुनें। टायर हमेशा ऑथराइज्ड डीलर से ही खरीदें और पक्का बिल जरूर लें। इससे टायर में दिक्कत आने पर उसे बदलने में सहूलियत रहेगी। टायर खरीदते समय ध्यान रखें कि उनकी मैन्युफैक्चरिंग डेट ज्यादा पहले की न हो। एक साल से पहले बने टायर हरगिज न खरीदें। इधर बाजार में चीन के बने टायर भी काफी दिख रहे हैं। उनके लुक्स पर न जाएं और वॉरंटी वाले टायर ही खरीदें।

2 Comments:

  1. Anonymous said...
    सुशान्त जी ब्लाग पर गया तो आप को देखा, और जब रूबरू हुआ आप की लेखनी से तो सुशान्त जी बिना धन्यवाद दिये नही रह सका!
    दिगम्बर नासवा said...
    ग़ज़ब की जानकारी . गाड़ी चलाते हैं एप्र आज इतनी जानकारी मिली ... शुक्रिया .......

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