हमारे समाज ने हमें बहुत सी सुविधा...बहुत से हक दिये है.....लेकिन हम उमसे अनजान है...जी हां....आईपीसी के मुताबिक, कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनमें दोनों पक्ष आपसी सहमति से समझौता कर सकते हैं और इसके बाद उन्हें कोर्ट-कचहरी के झंझटों से मुक्ति मिल सकती है।जेलों में बंद तमाम अपराधी ऐसे हैं, जो छोटे-मोटे जुर्म में सजा काट रहे हैं। अगर अपराधी या उसके वकील को सही जानकारी होती, तो इनमें से ज्यादातर मुकदमे साल-छह महीने या उससे भी कम वक्त में खत्म हो गए होते। भारतीय दंड संहिता में कुछ ऐसे अपराध परिभाषित किए गए हैं, जो जाने-अनजाने हो जाते हैं। ऐसे मामलों में अदालत में लंबे ट्रायल की जरूरत नहीं है। दोनों पक्ष चाहें तो आपस में समझौता कर मुकदमे को शुरू में ही खत्म करा सकते हैं। आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 320 के तहत संबंधित अदालत में आवेदन देकर ऐसा किया जा सकता है। ये छोटे-मोटे अपराध होते हैं इसलिए कानून में व्यवस्था है कि दोनों पक्ष आपस में समझौता करें और अदालत को बताएं कि उनके बीच समझौता हो चुका है। इसके बाद अदालत ऐसे मामलों को खत्म करने का आदेश दे देती है। ये सभी मामले धारा 320 (1) आपराधिक प्रक्रिया संहिता संशोधन 2008 के अंतर्गत आते हैं। जैसे-
1. किसी की धार्मिक भावनाओं को कुछ शब्द कहकर ठेस पहुंचाना (धारा 298)।
2. हल्की चोट पहुंचाना (धारा 323 व 334)।
3. किसी व्यक्ति को गलत तरीके से कहीं रोक देना या कैद करके रखना (धारा 341 व 342)।
4. किसी व्यक्ति को मारना, किसी के उकसाने पर हमला करना या आपराधिक बल प्रयोग करना, उकसाने पर या किसी और वजह से किसी का अनादर करने के लिए उस पर हमला करना (धारा 352, 355, 358)। समझौता उस व्यक्ति से होगा, जिसे मारा गया या जिस पर बल प्रयोग किया गया।
5. ऐसी शरारत, जिससे किसी व्यक्ति विशेष को नुकसान (आर्थिक) हुआ, हो या उसकी चीज नष्ट कर दी गई हो (धारा 426, 427)।
6. किसी की जगह या जमीन पर जबरन घुस जाना (धारा 447)।
7. घर में जबरन घुसना (धारा 448)।
8. सेवा शर्तों का उल्लंघन करना। मान लीजिए कोई व्यक्ति, शारीरिक रूप से असहाय किसी व्यक्ति की सेवा के लिए नियुक्त हुआ, पर उसने अपना काम नहीं किया और इसकी वजह से असहाय व्यक्ति को तकलीफ हुई (धारा 491)। उस व्यक्ति से समझौता होगा, जिससे असहाय व्यक्ति की सेवा के लिए कॉन्ट्रैक्ट हुआ हो।
9. अडल्टरी (व्यभिचार) धारा 497। समझौता उस महिला के पति से होगा, जिसके साथ व्यभिचार किया गया।
10. किसी विवाहित महिला को बहकाकर ले जाना, उसे गलत काम करने के लिए कैद करके रखना (धारा 498)। महिला के पति के साथ समझौता।
11. बदनाम करना (धारा 500)।
12. किसी को मार डालने या गहरी चोट पहुंचाने की धमकी देना (धारा 506)।
13. किसी व्यक्ति से यह कहकर कोई काम करवाना कि ऐसा नहीं करोगे तो ईश्वर नाराज होंगे (धारा 508)।
नोट : समझौता उसके साथ होगा, जो शख्स प्रभावित हुआ है।
अपराध, जिनमें अदालत की आज्ञा से होगा समझौता- कुछ अपराध ऐसे भी हैं, जिनमें अदालत की आज्ञा से समझौता किया जा सकता है। दरअसल, ये गंभीर किस्म के अपराध होते हैं इसलिए ऐसे मामलों को समझौते के आधार पर खत्म करने के लिए अदालत की आज्ञा जरूरी है। पहले समझौता उस पक्ष से कर-ना होता है, जिसे नुकसान हुआ या चोट पहुंची। फिर दोनों पक्ष मिलकर एक आवेदन संबंधित अदालत में देते हैं कि उनके बीच समझौता हो गया है। अदालत से कहा जाता है कि वह उस समझौते को मान्यता दे। ऐसा मुकदमे के शुरू में, बीच में, अंत में, ट्रायल कोर्ट में, अपील कोर्ट में कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है। इन अपराधों में अदालत की आज्ञा लेकर समझौता किया जा सकता है। अमूमन अदालत की आज्ञा आसानी से मिल जाती है।
1. किसी को जानबूझकर गहरी चोट पहुंचाना (धारा 325)।
2. जानबूझकर या अचानक किसी उकसावे पर गहरी चोट पहुंचाना (धारा 335)।
3. कोई ऐसा काम जल्दबाजी या लापरवाही से करना, जिसमें किसी को चोट लग जाए और उसकी जान पर बन आए (धारा 337)।
4. कोई ऐसा काम जल्दबाजी में या लापरवाही से करना कि आम जनता की जिंदगी खतरे में पड़ जाए (धारा 338)।
5. किसी को गलत तरीके से तीन दिन या उससे ज्यादा दिनों तक कैद करके रखना (343), किसी को 10 दिन या उससे ज्यादा कैद कर रखना (344), किसी को गुप्त तरीके से कैद करके रखना (धारा 346)।
6. किसी महिला के साथ दुराचार के लिए उसके साथ बल प्रयोग करना (धारा 354)।
7. किसी को कैद में रखने के लिए बल प्रयोग करना (357)।
8. ऐसी जगह पर चोरी, जहां चोरी की गई चीज की कीमत दो हजार रुपये से ज्यादा न हो (धारा 379)।
9. क्लर्क या नौकर द्वारा ऐसी चीज की चोरी करना, जिसकी कीमत दो हजार रुपये से ज्यादा नहीं हो (धारा 381)।
10. बेईमानी करके किसी की संपत्ति हड़प लेना (धारा 403)।
11. कई बार हम किसी के पास अपना कोई सामान (जेवर आदि) सौंपकर जाते हैं कि वापस आकर ले लेंगे, लेकिन वापस मांगने पर वह हमें नहीं देता। अगर ऐसे सामान की कीमत दो हजार रुपये से ज्यादा नहीं है तो धारा 406 लगेगी।
12. ट्रांसपोर्ट कंपनी द्वारा ऐसा सामान हड़प लेना, जिसकी कीमत 2000 रुपये तक है (धारा 407)। मान लीजिए आपने अपना सामान ट्रक से कहीं भेजा, लेकिन ट्रक वाले ने सामान नहीं पहुंचाया और बीच में ही गायब कर दिया। 13. क्लर्क या नौकर द्वारा दो हजार रुपये तक की बेईमानी करना (धारा 408)।
14. जानबूझकर चोरी की संपत्ति (जिसकी कीमत 2000 रुपये तक है) खरीदना (धारा 411)।
15. चोरी की गई किसी ऐसी चीज को छुपाना या बेचना, जिसकी कीमत 2000 रुपये तक है (धारा 414)।
16. धोखेबाजी (धारा 417, 418)।
17. भेष बदलकर, नाम बदलकर धोखा देना (धारा 419)।
18. किसी कीमती चीज को ठगना, किसी को वह चीज देने के लिए मजबूर कर देना या किसी कीमती चीज को नष्ट कर देना (धारा 420)।
19. किसी चीज (संपत्ति) को छुपा देना, एक जगह से हटा देना या उसका वितरण उनके बीच रोक देना, जिनको वह मिलनी थी (धारा 421)। मसलन राशन की दुकानों पर आने वाला सामान जिन लोगों के बीच बंटना है, उनके बीच न बांटकर उसकी कालाबाजारी कर दी जाए। इसी तरह मान लीजिए आपने अपनी नियत जगह पर गाड़ी पार्क की। किसी ने आपकी गाड़ी वहां से हटाकर कहीं दूसरी जगह पार्क कर दी। ऐसे मामलों में माना जाता है कि दूसरी जगह गाड़ी पार्क करने वाले का मकसद गाड़ी पर हाथ साफ करना है।
20. किसी ट्रांसफर डीड को बेईमानी से एक्जिक्यूट करना, जिसमें ट्रांसफर की कीमत के बारे में झूठा स्टेटमेंट हो (धारा 423)। ऐसी संपत्ति को छुपा देना या हटा देना (धारा 424)।
21. किसी के जानवर को मारना या अंग-भंग करना (धारा 428)।
22. किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उसके पानी की धारा मोड़ देना (धारा 430)। खेतों में लगाए गए पानी को अगर कोई मोड़कर अपने खेत में लगा लेता है, तो यह मामला बनता है।
24. झूठा ट्रेडमार्क या संपत्ति का मार्क व्यवहार में लाना (धारा 482)।
25. जानबूझकर नकली मार्क का सामान बेचना, खरीदना (धारा 486)। मसलन कोई किसी सामान को टिस्को का झूठा मार्क लगाकर बेच देता है तो यह मामला बनेगा।
26. पति या पत्नी के जिंदा रहते दूसरा विवाह रचाना (धारा 494)।
कबूल करने पर जल्द छुटकारा कई ऐसे अपराध हैं, जिनमें अधिकतम सजा दो साल से कम है। ऐसे मुकदमों में संक्षिप्त ट्रायल का प्रावधान है। आईपीसी की धारा 379, 380 और 381 को संक्षिप्त ट्रायल में लाया जा सकता है, बशर्ते चोरी की गई संपत्ति की कीमत दो हजार रुपये तक हो। ऐसे मामलों में अगर किसी का करिअर, नौकरी आदि खतरे में नहीं हैं तो अभियुक्त अपनी गलती मानकर सजा को काफी कम करवा सकता है और ट्रायल से जल्दी छुटकारा पा सकता है। मुकदमे की शुरुआती तारीख में ही ऐसा कर लेना चाहिए। प्ली बारगेनिंग 2005 के संशोधन से एक नई धारा 265-ए आपराधिक प्रक्रिया संहिता में जोड़ी गई। इसका नाम है प्ली बारगेनिंग यानी तर्कपूर्ण सौदेबाजी। पुलिस द्वारा दर्ज अपराधों में अपराधी प्ली बारगेनिंग का आवेदन कर सकता है। प्ली बारगेनिंग सिर्फ उन अपराधों में हो सकती है, जिनमें सात साल से कम सजा का प्रावधान है। शर्त यह भी है कि व्यक्ति का यह पहला अपराध हो। प्ली बारगेनिंग का आवेदन करने के बाद अदालत पीडि़त पक्ष को नोटिस भेजेगी। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और अभियुक्त के वकील को भी हाजिर होने के लिए कहेगी। अभियुक्त और पीडि़त भी अपने वकील के साथ रह सकते हैं। ये सब बैठकर पीडि़त को आथिर्क मुआवजा देने के मुद्दे पर बात करेंगे। (यह व्यवस्था उन अपराधों के लिए नहीं है, जिनकी वजह से देश की आथिर्क, सामाजिक स्थिति प्रभावित होती है। वे अपराध भी इस कैटिगरी में नहीं आते हैं, जो किसी महिला या 14 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ किए गए हैं) अगर कोई संतोषजनक हल निकल जाता है, तो सभी संबंधित पक्ष और कोर्ट के पीठासीन अधिकारी इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करेंगे और आखिर में कोर्ट का फैसला आएगा। सारी बातें सुलह करके जुर्माना देकर सुलझ जाती हैं तो अदालत अभियुक्त को डांट लगाकर और आईपीसी की धारा 360 के तहत अच्छा आचरण करने का निदेर्श देकर बॉन्ड पर रिहा कर सकती है। इस धारा के तहत दिया गया फैसला अंतिम होगा। उसकी अपील या रिविजन नहीं होगा। हां, किसी खास परिस्थिति में रिट याचिका दायर की जा सकती है।

शादी संबंधी मामले
शादी से संबंधित मामलों जैसे दहेज प्रताड़ना या दूसरी तरह के शारीरिक, मानसिक अत्याचार में (ऐसे मामले जिनमें धारा 498-ए के तहत मुकदमा दायर होता है) कानून समझौता करने की इजाजत नहीं देता है, लेकिन अगर पति, पत्नी या ससुरालवालों में समझौता हो जाए तो हाई कोर्ट में रिट दायर करके मामला निबटाया जा सकता है। इसी तरह आपसी सहमति से तलाक के मामलों में दोनों पक्ष हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13 बी (1) और धारा 13 बी (2) के तहत एक साथ अर्जी डाल सकते हैं और दो-चार दिनों में तलाक ले सकते हैं। नेकचलनी से पाएं राहत (प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट) आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 360 व 361 के मुताबिक, अगर 21 साल से बड़ा कोई शख्स किसी ऐसे अपराध में सजा पाता है, जिसमें सजा सिर्फ जुर्माना या सात साल की अधिकतम कैद है, तो वह अदालत से प्रार्थना कर सकता है कि उसे जेल न भेजा जाए। इसकी जगह उससे सजा अवधि तक का बॉन्ड भरवा लिया जाए कि वह इस दौरान कोई जुर्म नहीं करेगा। यह व्यवस्था सिर्फ उसी हालत में है, जब व्यक्ति का पहला अपराध हो। ऐसा आवेदन देने पर अदालत अभियुक्त की उम्र, चरित्र, फैमिली और क्रिमिनल बैकग्राउंड का प्रोबेशनरी ऑफिसर द्वारा पता लगवाकर उसे प्रोबेशन पर छोड़ देगी, जिससे वह एक शांतिप्रिय नागरिक बनकर अपने घर, करियर, व्यवसाय आदि की देखभाल कर सके। ऐसा आवेदन मुकदमे की किसी भी स्टेज पर (ट्रायल, अपील, रिविजन) दिया जा सकता है। प्रोबेशन पर छोड़ने के लिए अदालत की शर्तों को मानना जरूरी है, नहीं तो अदालत आदेश को कैंसल कर सकती है और अभियुक्त को जेल काटनी पड़ सकती है।
कुछ टिप्स
अगर अभियुक्त की उम्र 16 साल से कम है, तो शुरू में ही अदालत में आवेदन व दूसरे सर्टिफिकट देकर या ऑसिफिकेशन टेस्ट करवाकर कहें कि बच्चे का ट्रायल चिल्डेन कोर्ट में होना चाहिए। ऐसा करके उसे जमानत दिलवाई जा सकती है। अगर सजा होती है, तो उसे जेल नहीं जाना पड़ेगा। आप किसी मुकदमे में पीड़ित हों या अभियुक्त, अगर चाहते हैं कि मुकदमा जल्द खत्म हो जाए तो आपको मुकदमे के सभी कागजों की एक-एक कॉपी अपने पास रखनी चाहिए। मुकदमे की पूरी फाइल मेंटेन करें। अपने वकील के अलावा कानून के दूसरे जानकारों से भी सलाह-मशवरा करते रहें। संबंधित कानून को भी जानने की कोशिश करें। कोई महत्वपूर्ण बात अदालत को बतानी है, तो खुद भी बताएं।
दस्तावेज फाइल करने के लिए, गवाही देने के लिए या फिर किसी भी काम के लिए तारीख पड़े, तो उस काम को जरूर करें। सच कहना भी मुकदमों को लंबा खिंचने से बचाता है। आज जानकार इस बात को जरूरी समझते हैं कि ट्रायल कोर्ट में मैजिस्ट्रेट, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और पुलिस को कानून की जानकारी स्पेशल ट्रेनिंग के जरिए दी जानी चाहिए। ऐसा होने के बाद पुलिस मुकदमे का रजिस्ट्रेशन और पड़ताल जल्दी कर पाएगी। इसी तरह पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और मैजिस्ट्रेट भी मुकदमे का ट्रायल जल्दी और सही ढंग से कर पाएंगे। क्या आपको ये पता था...नहीं ना हमें भी नहीं था...

कमलेश जैन (लेखिका सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं।)

8 Comments:

  1. विपिन बिहारी गोयल said...
    Highly informative article.Thanks a lot.
    सुबोध said...
    बेहद खास जानकारी कानून की पेचीदगी से निकालता आर्टिकिल...बहुत बहुत धन्यावाद
    कुश said...
    वाह ये तो बड़े काम की जानकारी रही..
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
    जानकारी के लिए आभार!
    Unknown said...
    447,427,379,420 की धारा लगी हुई है। कोर्ट से एकपक्षीय स्टे लेकर जबरन घुस कर कब्ज़ा किया गया है और फर्जी दस्तावेज़ बनाया गया है (बिना पंजीयन). क्या करना चाहिए
    jain arvind said...
    447,427,379,420 की धारा लगी हुई है। कोर्ट से एकपक्षीय स्टे लेकर जबरन घुस कर कब्ज़ा किया गया है और फर्जी दस्तावेज़ बनाया गया है (बिना पंजीयन). क्या करना चाहिए
    mukesh kr singh said...
    very real and helpful facts
    MY FUTURISTIC SUPPORT said...
    Vahh

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