दिल्ली की सड़को पर फटे व मैले कुचैले कपड़े पहने भिखारी देख कभी यह मत सोचिएगा कि यह कोई अनपड़ होगा..हो सकता है...आपसे भीख मांगने वाला आपसे भी ज्यादा पढ़ा लिखा हो...भिखारियों पर किए गये एक सर्वेक्षण में दिल्ली में २६ भिखारी स्नातक तथा चार स्नातकोत्तर निकले... करीब दो दर्जन भिखारियों ने स्वीकार किया कि उनकी कमाई २०० से ५०० रूपये प्रतिदिन है...यह जानकारी केन्द्रीय सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता राज्य मंत्री डी नेपोलियन ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा में दी...


भारत में पूर्ण सूर्यग्रहण के मौक़े पर पर्यटकों को लुभाने की कोशिश जोर शोर से की जा रही है.
हालांकि भारत में पूर्ण सूर्यग्रहण केवल कुछ मिनट के लिए ही दिखाई देगा लेकिन पर्यटन कंपनियों ने इस मौक़े को भुनाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है.
गुजरात सरकार ने 22 जुलाई को पड़ने वाले पूर्ण सूर्य ग्रहण को पर्यटन के एक बड़े उत्सव के तौर पर मनाने का फ़ैसला किया है.
इसी तरह बिहार के पटना के पास तरेगना गाँव में सूर्यग्रहण पर पर्यटकों का जमावड़ा होगा.
टूर आपरेटर्स ने सूर्यग्रहण को दिखाने के लिए विशेष उड़ानों की व्यवस्था की है जो इस दौरान एक शहर से दूसरे शहर उड़ान भरेंगी.
इसमें खिड़की वाली सीटों के लिए विशेष क़ीमत वसूली जा रही है.
दरअसल नासा के अनुसार भारत में ये सूर्य ग्रहण सुबह 5 बजकर 28 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 40 मिनट तक देखा जा सकेगा.
लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण सुबह 6.26 से 6.30 तक चलेगा जिसमें सूर्य पूरी तरह छुप जाएगा.
भारत में पूर्ण सूर्यग्रहण भोपाल, सूरत, दार्जलिंग, वाराणसी और पटना के आसपास देखा जा सकेगा.
लेकिन दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बंगलौर, अहमदाबाद, कोलकाता और चेन्नई में आंशिक सूर्यग्रहण ही देखा जा सकेगा.
गुजरात के पर्यटन सचिव किशोर राव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गुजरात सरकार 22 जुलाई को सूरत में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रही है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि सूर्यग्रहण को देखने के लिए लगभग पाँच हज़ार पर्यटक सूरत में जुटेंगे.
सूर्यग्रहण भारत के पश्चिमी क्षेत्र से शुरू होगा और फिर पूर्वी भारत, बर्मा, जापान और चीन के छोटे द्वीपों की तरफ बढ़ेगा.

दोनों देशों के बीच अहम समझौते हुए अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों बीच तीन प्रमुख समझौते हुए हैं.ये समझौते रक्षा, परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष कार्यक्रम के क्षेत्रों में हुए हैं. दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण समझौता रक्षा क्षेत्र में हुआ है. इसके तहत अमरीकी रक्षा तकनीक और उपकरणों के आयात का रास्ता साफ़ होगा.
एंड यूजर मानीटरिंग समझौते के बाद अमेरिका भारत को संवेदनशील सैन्य तकनीक बेच सकेगा और दोनों देशों के बीच और अधिक सामरिक और रणनीतिक सहयोग का रास्ता साफ हो जाएगा.
सूत्रों के मुताबिक अमेरिकी खेमा इस समझौते के तहत सालाना निरीक्षण की जिद छोड़ने के लिए राजी हो गया है. इस समझौते से अमरीका की प्रतिरक्षा कंपनियों को करोड़ो का व्यापार करने का मौका मिलेगा.
इन परियोजनाओं से रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे और बिजली की कमी भी दूर होगी. दोनों देशों ने टेक्निकल सेफगार्ड समझौता भी किया है जिसके तहत भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए अमरीकी उपकरण प्राप्त कर सकेगा.
भारत और अमरीका के बीच रक्षा संबंधों को मज़बूत बनाने पर सहमति बनी है. दोनों देशों ने आतंकवाद का मिल कर मुक़ाबला करने की प्रतिबद्धता जताई है.
इन समझौतों पर दिल्ली में अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने हस्ताक्षर किए.

हिलेरी ने मनमहोन सिंह को अमरीका आने का न्यौता सौंपा है
इसके बाद साझा प्रेस कॉंफ़्रेंस में भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा कि हिलेरी क्लिंटन भारत से पहले से परिचित रही हैं जिससे द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिली है.
उन्होंने कहा, “दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु समझौते, जलवायु परिवर्तन, परमाणु अप्रसार और अर्थव्यवस्था की चुनौतियों पर चर्चा हुई.”
दोनों देशों के बीच तीन अहम समझौते हुए हैं. पहला समझौता विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के संबंध में है.
आतंकवाद
अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन के साथ बातचीत में आतंकवाद के ख़तरों पर साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की.
उन्होंने कहा, “ मैं दोनों देशों के बीच मज़बूत संबंध बनाने के लिए आई हूं. राष्ट्रपति ओबामा और मेरा विश्वास है कि दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध 21 वीं सदी के लिए ज़रूरी है.”
हम पाकिस्तान के साथ दोस्ताना संबंध चाहते हैं. मुंबई हमलों ने समग्र वार्ता को पीछे धकेल दिया. तब से अब तक राजनीतिक संवाद कायम हुआ है. संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान हम पाकिस्तान के विदेश मंत्री से फिर मिलेंगे
एसएम कृष्णा
हिलेरी का कहना था, “हमने सभी अहम मुद्दों पर चर्चा की. कुछ मुद्दों पर अलग-अलग विचार है. लेकिन मेरा विश्वास है कि असहमतियों को दूर किया जा सकता है.”
अमरीकी विदेश मंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति ओबामा की ओर से उन्हें 24 नवंबर को अमरीका आने का न्यौता दिया.
पाकिस्तान के साथ संबंधों पर एसएम कृष्णा ने कहा, “हम पाकिस्तान के साथ दोस्ताना संबंध चाहते हैं. मुंबई हमलों ने समग्र वार्ता को पीछे धकेल दिया. तब से अब तक राजनीतिक संवाद कायम हुआ है. संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान हम पाकिस्तान के विदेश मंत्री से फिर मिलेंगे.”

एनआईएस पटियाला, एथलीटों का ट्रेनिंग हब. यहां कई कैम्प चल रहे है... इनमें पुरूष बॉक्सिंग कैम्प भी है..१६ जुलाई को सेलेक्शन ट्रायल था...इससे देखने के लिए बॉक्सिंग से जुड़े बहुत से लोगों के साथ-साथ मीडिया के लोग भी मौजूद थे...इन लोगो की आवभगत (चाय,पानी आदि सर्व करने में) लगी थी.. दो लड़किया.. इनमें से एक लड़की थी..विश्व चैंपियनशिप की कांस्य विजेता रेनू गोंरा... और पूछने पर पता चला कि कि आज उसके पास कोई नौकरी नहीं है..इसलिए उसने एनआईएस से एक साल का कोचिंग कोर्स कर लिया...जिससे उसे खेल का थोड़ा नॉलेज हो जाए और हो सकता है...कोई जॉब भी मिल जाएं...और फिर बताती है... कि सर जो कहते है...करना पड़ता है...सर ने यहां चाय पानी पिलाने में हमारी डयूटी लगाई थी...और वही हम कर रहे है...उसका कहना है,,कि वो सीनियर है..तो उनकी बात तो माननी ही पडे़गी...और इतना ही नहीं ये सबके जूठे कप गिलास भी माजती है... तो ये सचाई है....हमारे देश की ...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देशवासियों को आश्वस्त किया है...कि आतंकवाद के खिलाफ हरसंभव कार्रवाई करने के पाकिस्तान के आश्वासन के बाद ही भारत ने समग्र वार्ता प्रक्रिया को आतंकवाद के मुद्दे से अलग रखने पर सहमति जताई है...हालाकि विपक्ष में बैठा भाजपा इस बयान से संतुष्ट नही है..भाजपा का आरोप है..कि आतंकवाद को समग्र वार्ता प्रक्रिया से न जोड़ा जाना देश के साथ विश्वासघात है...और सरकार ने ये कदम अंतरराष्ट्रीय दवाब में उठाया है...डॉ सिंह ने लोकसभा में शुक्रवार को दिए गए वक्तव्य में कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ गिलानी ने उन्हें भरोसा दिलाया है...कि उनका देश आतंकवाद के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेगा... और मुंबई हमलों के दोषियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए हर संभव प्रयास करेगा....
संयुक्त बयान पर उठे सवाल क्योंनबंर एक- आतंकियों पर कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर बरोसा किया जा सकता है?पाकिस्तान अभी भी जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद को लेकर दुलमुल है...नबंर दो- संयुक्त बयान से आतंकवाद अलग क्यों?अरसे से पाकिस्तान ये मानता रहा है... कु वो आतंकवाद का उपयोग कश्मीर को जीतने में कर रही है...और फिर नागरिक सरकार ऐसा सोच सकती है....पर क्या इससे सेना भी सहमत है?नबंर तीन- अगर मुंबई की तरह एक और हमला होता है?भारत सिर्फ ये उम्मीद ही तो कर सकता है... कि पाकिस्तान इन समूहों पर शिकंजा कसेगा...क्या एक उम्मीद भर पर फैसला सही होगा?


( तहलका से साभार लिया गया लेख…बताता है कि क्या हैं सोमनाथ होने के मायने )

जो सही लगा वही करने वाले सोमनाथ चटर्जी को ऐसा ही कुछ करने पर सीपीएम ने पार्टी से निष्कासित कर दिया है। चटर्जी की शख्सियत को करीब से जानने का प्रयास कर रहे हैं शांतनु गुहा रे..........
14 वीं शताब्दी में इंग्लैंड के लॉर्ड चांसलर (इंग्लैंड के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्डस के अध्यक्ष) मोर ने सिद्धांतों को व्यावहारिकता पर तरजीह देते हुए अपने मित्र हेनरी अष्टम की तलाक की याचिका पर सहमति की मुहर लगाने से इनकार कर दिया था। अपने सिद्धांतों की रक्षा की खातिर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया, गिरफ्तार हुए और मौत को गले लगा लिया। वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पिछले कुछ दिनों में जो कुछ किया है सिद्धांतों के लिहाज से कुछ-कुछ मोर की याद दिला देता है। चटर्जी ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के उस आदेश को नज़रअंदाज कर दिया जिसमें उन्हें लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर 22 जुलाई को मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विश्वासमत प्रस्ताव पर वोट डालने के लिए कहा गया था। सवाल ये उठता है कि भारतीय राजनीति की सबसे अनुशासित पार्टी की संस्कृति में आकंठ डूबे इस व्यक्ति को किस चीज़ ने इतना मुखर विद्रोही बना दिया? 79 वर्षीय सोमनाथदा को नज़दीक से जानने वालों के लिए उनकी समझौता न करने वाली छवि कोई नई बात नही है। उनकी अपनी एक मौलिक सोच हैं और इसका आभास उनके साधारण से घर की दीवारों पर देखने से ही मिल जाता है। यहां सिर्फ दो चित्र नज़र आते हैं. एक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और दूसरा ज्योति बसु का। स्पष्ट रूप से यही दो लोग उनके आदर्श हैं। मार्क्सवादियों के आदर्श ब्लादिमिर लेनिन, कार्ल मार्क्स या फ्रेडरिक एंगल के उलट उनकी ये पसंद हैरत में डालती है। चुनौती देना शुरुआत से ही उनके चरित्र का हिस्सा रहा है। उनके पिता निर्मलचंद्र, हिंदू महासभा के अध्यक्ष और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विश्वस्त थे। इस पारिवारिक विरासत के बावजूद उन्होंने 1968 में सीपीएम से जुड़ने का फैसला किया। ये उनकी स्वतंत्र सोच का परिचायक था जिसका प्रदर्शन बाद में उन्होंने समय-समय पर किया। 1971 में उन्होंने बोलेपुर से निर्दलीय के रूप में--सीपीएम के समर्थन से--उपचुनाव जीता। ये सीट उनके पिता की मृत्यु हो जाने से खाली हुई थी। इसके बाद वो सीपीएम के टिकट पर अगले नौ लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। इस दौरान 1984 में उन्हें सिर्फ एक बार ममता बनर्जी के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन सीपीएम से अपने चार दशक लंबे जुड़ाव के बावजूद चटर्जी कभी भी पूरा तरह से पार्टी का हिस्सा नहीं बन सके। वो पार्टी से बर्खास्त किए जाने के वक्त भी पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य नहीं थे। उन्हें पार्टी की केंद्रीय समिति का सदस्य भी 90 के दशक के अंत में ज्योति बसु के आग्रह पर बनाया गया था। उनसे किसी को नाराज़गी नहीं है लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि उनकी अलग सोच और खुल के बोलने की आदत परेशानी का कारण बन जाते हैं। 1996 में जब ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनने का मौका चूक गए तब उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा कि सीपीएम द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री न बनने देना एक “ऐतिहासिक भूल” थी। ये कितनी बड़ी भूल थी ये पार्टी के भीतर और मीडिया में हर सुनने की चाह रखने वाले को चटर्जी ने बताया। उन्होंने कहा कि मार्क्सवादियों को अब ‘बैकसीट ड्राइविंग’ बंद कर देनी चाहिए। “बंगाल अब पीछे से राजनीति करने वालों को नहीं झेल सकता।”
अगर उन्होंने पार्टी के कट्टरवादियों और उनकी नियंत्रणवादी प्रवृत्ति की आलोचना की तो किसी मुद्दे पर असहमत होने पर अपने नज़दीकियों को भी नहीं बख्शा। इस बात को जानते हुए भी कि ज्योति बसु कट्टर सीटू(कंफेडरेशन ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन) नेता थे, सोमनाथ ने जूट मिलों को बंद करवाने के सीटू के तौर तरीके पर खुल कर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया। उन्होंने एक बार कहा था, “तालाबंदी आखिरी विकल्प है। इसका सहारा तभी लेना चाहिए जब आपके पास दूसरा कोई विकल्प ही न बचा हो।”ट्रेड यूनियनों के साथ उनके टकराव को भांप कर बसु ने उन्हें पश्चिम बंगाल व्यापार विकास निगम (डब्ल्यूबीआईडीसी) का चेयरमैन बना दिया। उत्साही सोमनाथ तुरंत ही राज्य में निजी निवेश का खाका खींचने लगे। उन्होंने निजी कंपनियों के साथ रिकॉर्ड 100 से ज्यादा समझौतों पर दस्तखत किए। ये अलग बात है कि उनमें से करीब 95 फीसदी असफल रहे क्योंकि चटर्जी की योजनाओं को उनकी पार्टी का ही समर्थन नहीं मिल सका। इनमें से एक योजना कोल इंडिया द्वारा कोलकाता के पूर्वी बाइपास के पास विशाल हॉस्पिटल बनाने की थी, मगर ये शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ सकी।
पर इस तरह के प्रतिरोध न तो उनकी एकाग्रता को भंग कर सके और न ही उनकी कोशिशों को। उन्होंने डब्ल्यूबीआईडीसी के अपने सहयोगियों से निराश न होने और देश के शीर्ष उद्योगपतियों के संपर्क में बने रहने को कहा। वो कहते थे, “आपको उन नकारात्मक विचारों का खात्मा करना है जो बाहरी दुनिया के मन में पश्चिम बंगाल के प्रति हैं।” विचारधारा पर कायम रहना और निजी निवेश की आवश्यकता को समझने की क्षमता ही उनकी एकमात्र ताकत नहीं थी। उनकी क़ानूनी प्रतिभा भी देखने योग्य थी। 1984 में पश्चिम बंगाल सरकार की पैरवी करते हुए उन्होंने एक ऐसी ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को देश की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। केस का विषय ये था कि क्या मतदाता सूची में नाम न होने की हालत में किसी चुनाव को रोका जा सकता है। चटर्जी ने तर्क दिया कि एक बार शुरू हो जाने के बाद चुनावी प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता और भारत में ये संभव ही नहीं है कि सारे वोटरों के नाम मतदाता सूची में शामिल हों।1984 में पश्चिम बंगाल सरकार की पैरवी करते हुए उन्होंने एक ऐसी ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को देश की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सोमनाथ के विरोधी (मुख्यत: मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य और उद्योगमंत्री निरुपम सेन) कभी भी खुलेआम उनसे मुकाबला नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सोमनाथ को हाशिए पर धेकलने का रास्ता चुना। उन्होंने पार्टी में उनकी महत्ता को कम करके बोलेपुर में उन्हें कुछ छोटी-छोटी परियोजना के काम में लगा दिया। चटर्जी ने श्रीनिकेतन और शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण स्थापित करके उसी उत्साह से विकास परियोजनाओं की शुरुआत की जैसा उत्साह उन्होंने राज्य में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए दिखाया था। जब पार्टी ने उनकी आलोचना की और उन्हें कोर्ट में घसीटा गया--वामपंथी लेखिका महाश्वेता देवी ने ये कह कर उन्हें कोर्ट में घसीटा कि वो शांति निकेतन की खोवाई या लाल मिट्टी को एक आवासीय परियोजना की वजह से बर्बाद कर रहे हैं--तो उन्होंने पूरी शिद्दत से केस लड़ा औऱ सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ सारे आरोपों को खारिज कर दिया।
आधारभूत ढांचे के विकास चटर्झी की प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर रहा। बोलेपुर में उन्होंने पश्चिम बंगाल के सबसे बढ़िया गीतांजलि ऑडीटोरियम और एक बेहद आधुनिक स्टेडियम की स्थापना की। वो मज़ाक में कहते थे, “अब अगर आप स्तरीय फुटबॉल खिलाड़ी नहीं पैदा कर पाते हैं तो मुझे दोष मत दीजिएगा।” ये एक साधारण टिप्पणी है लेकिन उनकी स्पष्टवादिता का अंदाज़ा दे देती है। वो जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं। अगर लोकसभा अध्यक्ष पद को लें तो यहां वो सीपीएम के प्रत्याशी न होकर सर्वसम्मति से चुने गए थे इसलिए पार्टी व्हिप पर बिना लागलपेट के उनकी सीधी प्रतिक्रिया थी कि इस पद को संभालने का मतलब ये है कि वो पार्टी की राजनीति से परे हैं। वो अपरंपरागत मार्क्सवादी हैं, उनकी ईमानदारी पर किसी को लेशमात्र भी संदेह नहीं है। उनके दोस्त बताते हैं, जब वो 20 अकबर रोड वाले घर में पहुंचे तो उन्हें पता चला कि यहां चाय बिस्किट से लेकर साबुन तक का खर्च लोकसभा के खाते से अदा होता है। “मेरे ख्याल से मैं अपने बाथरूम का खर्च उठा सकता हूं। और मैं अपने मेहमानों के लिए एक कप चाय का खर्च भी उठा सकता हूं,” चटर्जी ने कहा और इसे बंद करवा दिया।
हालांकि लोकसभा अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। 2005 में चटर्जी ये बयान देकर संकट में पड़ गए कि सुप्रीम कोर्ट झारखंड विधानसभा के मामले में आदेश देकर विधायकों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है। विपक्ष ने लाभ के पद को मुद्दा बना कर उनके त्यागपत्र की माग की क्योंकि वो शांतिनिकेतन श्रीनिकेतन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष थे। अपनी विशेष अदा में उन्होंने ये कहकर सारे आरोपों को दरकिनार कर दिया कि वो किसी भी तरह का लाभ नहीं उठा रहे हैं और सारे आरोप निराधार हैं। आज ये गुस्ताख, मार्क्सवादी अपनी ही पार्टी के कट्टरपंथियों के निशाने पर है, जबकि इसी दृढ़ रुख के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रशंसा हो चुकी है। हालांकि अपने भविष्य के बारे में उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया लेकिन उनके नजदीकी लोगों की माने तो सोमनाथदा राजनीति से दूर शांतिनिकेतन में रहना चाहते हैं।
भले ही 22 जुलाई के बाद सोमनाथ चटर्जी का भविष्य अनिश्चित हो गया हो लेकिन उन्हें खुद के सही होने को लेकर कोई संदेह नहीं है...शायद, कभी भी नहीं था...
शांतनु गुहा रे

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